सोमवार, 24 मार्च 2014

अरुण से ले प्रकाश तू / (गीत)


अरुण से ले प्रकाश तू
तिमिर की ओर मोड़ दे !

मना न शोक भूत का
है सामने यथार्थ जब
जगत ये कर्म पूजता
धनुष उठा ले पार्थ ! अब
सदैव लक्ष्य ध्यान रख
मगर समय का भान रख
                           तू साध मीन-दृग सदा
                            बचे जगत को छोड़ दे !

विजय मिले कि हार हो
सदा हो मन में भाव सम
जला दे ज्ञान-दीप यूँ
मनस को छू सके न तम
भले ही सुख को साथ रख
दुखों के दिन भी याद रख
                         हृदय में स्वाभिमान हो
                          अहं को पर, झिंझोड़ दे !

अथाह दुख समुद्र में 
कभी कहीं जो तू घिरे
न सोच, पाल तान दे
कि दिन बुरा अभी फिरे
तू बीच सिन्धु ज्वार रख
न संशयों के द्वार रख
                      उदासियों की सीपियाँ
                     पड़ी हुईं जो, फोड़ दे !

4 टिप्‍पणियां: