गुरुवार, 5 मई 2011

सुबह, शाम और रात..



एक सुबह थी..
जब सपने में देख रहा था तुम्हें ही छुप-छुपकर
और फिर तुम्हारी ही आवाज से नींद खुली थी मेरी  
मानों धप्पा मारा हो किसी ने 'आईस-बाईस' में

एक शाम थी..
जब मेरी किसी बात से चिढ़कर तुमने कसकर एक
मुक्का मारा था मेरी पीठ पर और खुद ही रो पड़े थे
मानों कोई बच्चा गलती करके लिपट गया हो माँ से 

 
एक रात थी..
जब दो घंटे और तैंतीस मिनट बातें करने के बाद
'गुड नाइट' कहकर तुमने फोन रखा तो ऐसा लगा
मानों बीच में ही रुक गया हो कोई फेवरिट सा सौंग

 
सोचता हूँ, कभी मैं भी अमीर था कारूँ जितना
सोचता हूँ, कभी मुझ पर भी खुदा मेहरबान था 
***

2 टिप्‍पणियां:

  1. मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का..
    उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िल पे दम निकले..

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  2. आपके ब्लाग पर पहली बार आया हूँ |आइस- पाईस की थपकी ने मुझे बचपन में पहुंचा दिया|
    व्यंग्य के माध्यम से बात कहना अच्छा लगा , बधाई

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