मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

लोग


...ऐसे लोग...
...वैसे लोग...
मेरे जैसे नहीं होते अब,
मेरे चेहरे जैसे लोग..

किताबों में ढूढ़ते..
गुजरते वक़्त को,
कब के गुजर गए;
गुजरे वक़्त जैसे लोग..

ये काबा तेरा;
ये शिवाला मेरा,
नींदों में कंधा बाँटते..
ये सरहदों जैसे लोग..

मंदिर की चौखट पे;
होती थी बैठकबाजी,
जाने कब मुसलमाँ बने;
ये मज़हबों जैसे लोग..

अजमत-ए-खुदा थी;
जो रंग-ए-सुर्ख दिया,
कल ज़मीन से निकलते;
नीले-पीले से लोग..

लिखता हूँ नज़्म;
बन जाती है मुअम्मा,
अब कौन सुलझाए;
खुद उलझे से लोग..??

देख रखी है दुनिया;
थोड़ी सी हमने भी,
केवल दो होते हैं;
अच्छे लोग औ बुरे लोग...

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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