यहाँ सिर्फ ग़ज़लें, नज्में या मजमुए ही नहीं.. .. यहाँ मेरे जज़्बात हैं, जिन्हें शायद कभी मैं अपनी जुबां से कहने में चूक गया.. .. यहाँ मेरी तन्हाईयाँ हैं, जो अचानक से मुझे खुश करती हैं तो कभी रुला देती हैं.. .. यहाँ मेरे तजुर्बे हैं, जो मैंने ज़िन्दगी की राह पे चलते वक़्त इधर-उधर से बटोरे हैं..
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
बुधवार, 21 जनवरी 2009
अंतर
आज मैंने देखा...
मंडराते हुए
इधर उधर घूमते हुए
कौवों के झुंड को..
और खाते हुए नरमुंड को...
आज मैंने पा लिया,
मानवों और कौवों में
अंतर पता लगा लिया...
वे देते हैं श्रद्धांजलि मंडराकर,
तब खाते हैं..
पर ये जो मानव हैं..
मंडराकर, खाकर,
तब श्रद्धांजलि दे पाते हैं...
मंडराते हुए
इधर उधर घूमते हुए
कौवों के झुंड को..
और खाते हुए नरमुंड को...
आज मैंने पा लिया,
मानवों और कौवों में
अंतर पता लगा लिया...
वे देते हैं श्रद्धांजलि मंडराकर,
तब खाते हैं..
पर ये जो मानव हैं..
मंडराकर, खाकर,
तब श्रद्धांजलि दे पाते हैं...
कौन हूँ मैं...?
कौन हूँ मैं...
हाँ.. कौन हूँ मैं...
इसी का तो खोज रहा जवाब,
की कौन हूँ मैं...
क्या मैं वो हूँ,
जिसे उसकी माँ दूर भेजते हुए
अपने आंसू पोछती है...,
और फिर...
कब आएगा मेरा लाल
यही सोचकर उसकी राह तकती है...
क्या मैं वो हूँ,
जिसे उसका बाप कहता है
तुम्हे एक दिन बहुत आगे बढ़ना है...,
और मेरा नाम...
इस दुनिया में रोशन करना है...
हाँ, वही तो हूँ शायद मैं...
हाँ.. हाँ, वही तो हूँ मैं...
पर क्या फायदा ये जानकर
जब चलना है दूसरों की मानकर,
करना तो था कुछ और...
लेकिन सोते रहे चादर तानकर...
लेकिन है भरोसा एक दिन
अपना जहाँ बना बनाऊंगा मैं,
और तभी शायद इसका जवाब
ढूंढ पाऊंगा मैं... की
कौन हूँ मैं...?
कौन हूँ मैं...?
***
(मेरी पहली कविता, जो ०७-अप्रैल-२००४ को रात ९:२० बजे रमन छात्रावास, लखनऊ में लिखी थी.)
हाँ.. कौन हूँ मैं...
इसी का तो खोज रहा जवाब,
की कौन हूँ मैं...
क्या मैं वो हूँ,
जिसे उसकी माँ दूर भेजते हुए
अपने आंसू पोछती है...,
और फिर...
कब आएगा मेरा लाल
यही सोचकर उसकी राह तकती है...
क्या मैं वो हूँ,
जिसे उसका बाप कहता है
तुम्हे एक दिन बहुत आगे बढ़ना है...,
और मेरा नाम...
इस दुनिया में रोशन करना है...
हाँ, वही तो हूँ शायद मैं...
हाँ.. हाँ, वही तो हूँ मैं...
पर क्या फायदा ये जानकर
जब चलना है दूसरों की मानकर,
करना तो था कुछ और...
लेकिन सोते रहे चादर तानकर...
लेकिन है भरोसा एक दिन
अपना जहाँ बना बनाऊंगा मैं,
और तभी शायद इसका जवाब
ढूंढ पाऊंगा मैं... की
कौन हूँ मैं...?
कौन हूँ मैं...?
***
(मेरी पहली कविता, जो ०७-अप्रैल-२००४ को रात ९:२० बजे रमन छात्रावास, लखनऊ में लिखी थी.)
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